नई दिल्ली। केंद्र में भाजपानीत एनडीए सरकार को तीन साल होने वाले हैं लेकिन साफ है कि गोरखालैंड को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। हिमालयी लोग पोर्टल गोरखालैंड के पक्ष में है।
पश्चिम बंगाल में पांव पसारने की कोशिश में जुटी भाजपा इस मुद्दे पर दुविधा में है। उसे आशंका है कि यदि गोरखालैंड को लेकर कोई पहल करती है तो उसे बंगाली समुदाय के कोप का भाजन सहना पड़ेगा। जबकि दार्जिलिंग के नेपाली समुदाय को भी वह लंबे समय तक अंधेरे में  नहीं रख सकती है।
दरअसल, दार्जिलिंग के गोरखा और नेपाली समुदाय लोकसभा के पिछले दो चुनाव से भाजपा का भारी समर्थन करता आ रहा है। उन्होंने पहले तो भाजपा के जसवंत सिंह और अब एसएस अहलूवालिया को संसद भेज दिया। हालांकि  कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि उन्हें गोरखा समुदाय के ही व्यक्ति को सांसद चुनना चाहिए था। जिस तरह से बोडोलैंड को लेकर बसुमतियारी लोकसभा में आवाज बुलंद करते रहे हैं, गोरखा सांसद भी करता। ऐसी उम्मीद पहले जसवंत सिंह और अब अहलूवालिया से करना संभव नहीं है। बहरहाल, गोरखा समुदाय को समझ लेना चाहिए कि भाजपा के एजेंडा में अभी गोरखालैंड प्राथमिकता में नहीं है।
गोरखालैंड– गोरखा पहचान व अस्मिता तथा क्षेत्रीय विकास के लिए अलग गोरखालैंड की मांग 1980 में शुरू हुई। गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जी.एन.एल.एफ.) प्रमुख सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में लगभग दो दशक तक चले हिंसक आंदोलन के बाद ज्योति बसु सरकार ने दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद का गठन किया था। घिङ्क्षसंग ही बाद में इस परिषद के सर्वेसर्वा बने। स्वायत्तशासी निकाय के तहत एकमुश्त बजट के साथ विकास की कमान भी घीसिंग के हाथों दी गई।
पश्चिम बंगाल के लोग गोरखालैंड बनानेे के सख्त खिलाफ हैं। इसलिए वाबपंथी सरकार ने घिसिंग को परिषद में शांत करा दिया। दो दशक तक अलग राज्य की मांग के एवज में मिले कौंसिल को थके-हारे घीसिंग ने स्वीकार भी कर लिया। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं।
पहले वामपंथी सरकार और फिर तृणमूल कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा कि उसने  गोरखलैंड क्षेत्र के लोगों को गोरखा, गैर गोरखा, बंगाली, गैर बंगाली आदि समुदायों में बांटकर आंदोलन को कमजोर कर दिया। बाद में विमल गुरंग के नेतृत्व में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने आंदोलन तेज किया,लेकिन राज्य का सपना वहीं का वहीं रह गया। अब मामला भाजपा के पाले में है।
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