प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा का मानना है कि पिघलते ग्लेशियरों से लेकर चौतरफा संकटों से घिरे हिमालय के लिए अब चीन एक बड़े खतरे के तौर पर सामने आ गया  है। इसलिए भारतीय हिमालय विशेषतौर पर मध्य हिमालयी क्षेत्र से युवकों का पलायन रोकना जरूरी है। बहुगुणा की पदमादत्त नंबूरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

-हिमालयी ग्लेशियरों को लेकर आप क्या सोचते हैं। क्योंकि ग्लेशियरों को लेक विरोधाभाषी रिपोर्ट आई हैं। एक कहती है कि ग्लेशियर २०३० तक खत्म हो जाएंगे, जबकि दूसरी कहती है कि कई ग्लेशियर बढ़ भी रहे हैं।
सच यही है कि ग्लेशियर लगातार पीछे खिसकते जा रहे हैं। मैं पिछले दिनों गंगोत्री गया था, वहं देखा कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जल संकट अब सबसे बड़ी समस्या बनने जा रहा है। इसलिए पानी चाहिए तो हिमालय बचाना जरूरी है। मैं  इस बात में यकीन नही कर सकता कि ग्लेशियर बढ़ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों की घाटियां हिमालय की तरफ बढ़ रही हैं। जब नई बर्फ पड़ ही नहीं रही है तो फिर कैसे कह सकते हैं कि ग्लेशियर बढ़ रहे हैं। मेरा मानना है कि
–    धार एंच पाणी
–    ढाल पर डाला
बिजली बनाओ खाला-खाला
यानी ,नीचे नदियों में बहते पानी को ऊपर पहाड़ों की चोटी तक पहुंचाओ, उस पानी का उपयोग कर हर पहाड़ी पर पेड़ लगाओ, फिर हर छोटी नदी से बिजली बनाओ। इससे हिमालय की पूरी समस्या का समाधान हो जाएगा।

– आप हिमालय को प्राकृतिक बांध बनाने की बात करते हैं जरा विस्तार से बताइए
हम चाहते हैं कि हिमालय को पेड़ों से ढका जाए। इससे बारिश का पानी वहां जम हेगा। इसलिए कहतेैं कि हिमालय में कृत्रिम बांध बनाने की बजाए प्राकृतिक बांध बनाया जाए। पेड़ बढ़ने से लोगों को खाना मिलेगा, पशुओं को चारा और उद्योगों को रेसा मिलेगा। ऐसे रेसेदार पेड़ों को काटना नहीं पढ़ेगा। हमें भूटान की तरह भारत के हिमालय क्षेत्र को पेडों से ढकना होगा। अखरोट जैसे पेड़ लगाने की जरूरत है। इसके लिए कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक ऐसे युवकों की आवश्यवता है जो चुनाव के समय इन मुद्दें कोे उठाएं। राजसत्ता का आधार जनता की इच्छा शक्ति है , हमें सरकारों के यह बताना होगा। मैं उम्र के अंतिम पड़ाव पर हूं, आप जैसे युवक अब हिमालय की वेदना को देश-दुनिया के सामने पहुंचाएं। तीन काम जरूरी हैं। एक तो मीडिया का सहयोग लेगर हिमालय के सरोकारों को देश-दुनिया में प्रचारित करें, इसे संसद तक पहुंचाएं और सरकार को मजबूर करें कि हिमालय को लेकर व्यवहारिक कदम उठाए। हिमालय नीति बनाएं। नीति निर्धारकों को मजबूर  करें। यह बहुत बड़ा काम नहीं है छोटा सा ही है।

-जंगल बढ़ने से लोगों और जंजली जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। बाघ भी मनुष्यों को खा रहे हैं।
जंगल घटेंगे तो जंगली जानवर खुद को भी तो बचाएंगे। बाघ बढ़ रहे हैं और लोगों को खा रहे हैं यह दुष्प्रचार है। ये दुष्प्रचार वे लोग करत हैं जो जंगल काटते हैं।

-चीड़ के पेड़ को लेकर  आप विरोध में क्यों हैं?
हिमालय कभी बहुत संपन्न था। लोग पशुपालन करते थे, खुशहाल थे, लेकिन अंग्रेजों ने वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट कर दी। अग्रेज व्यापारी थे, उन्होंने लोगों से कहा कि खेती करो और खुद चीड़ के पेड़ लगा दिये। चीड़ ने वहां की मिट्टी के तेजाबी बना दिया। मिट्टी बरबाद कर दी। पानी खत्म हो गया। अब घास उगलती ही नहीं है। अंग्रेज तो व्यापारी थे, उन्होंने हिमालय क्षेत्र में चौड़ी पत्ती व फलदार पेड़ों की जगह चीड़ लगा दिया। यह मिट्टी सुखा देता है। इससे हिमालय को भारी नुकसान हो गया। आजादी के बाद की सभी सरकारों ने भी अंग्रेजों की पैसा कमाओ की नीति को ही  बढ़ाया। शराब का प्रचलान बढ़ाया, यह तो हमारी खुशकिस्मती रही कि वहां की जागरुक महिलाओं ने आंदोलन करके इस पर नियंत्रण लगवा दिया। वहां की महिलाएं बहादुर हैं, चिपकों से लेकर जीवन के हर आंदोलन मं आगे रहती हैं।

 -आपकी नजर में हिमालय पर क्या -क्या खतरे सामने हैं?
यह बदकिश्मती है कि पहाड़ का युवक आज भी मैदानों की ओर पलायन कर रहा है। जबकि देश की सुरक्षा की दृष्टि से हिमालय में जवान लोगों का रहना जरूरी है। उन्हें वहां रोजगार देना होगा,  रोजगार वृक्षों से मिल सकता है। हम दिल्ली को तो पानी देते हैं लेकिन टिहरी बांध के आसपास के गांव पानी के लिए बेहाल हैं। पिछले दिनों वहां सात महिलाओं ने  टिहरी बांध में कूदकर आत्म हत्या करदी। यह दुखद है कि हमारा पानी हमारे पीने के लिए नहीं आत्महत्या करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

हिमालय के लिए नया खतरा चीन है। चीन ने तिब्बत कर कब्जा कर लिया है। विचारधारा के कारण नेपाल पर उसका असर बढ़ गया है। यहां भी गांव-गाव तक चीन के लिए सुगम रास्ता हो गया है। अब विश्व में नई लड़ाई विचारों की होगी। खासतौर पर पूरे हिमालय में यह विचारों की लड़ाई फैल सकती है। इस वैचारिक आक्रमण को रोकने के लिए हिमालय को खड़ा करना होगा। हिमालय समग्र प्रहरी है।  इसलिए हिमालय के प्रति चिंतित युवकों को प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें इन खतरों से अवगत कराना होगा। उन्हें बताना होगा कि हिमालय को संपन्न करना जरूरी है। हिमालय को गरीबी से मुक्त करना होगा।

-प्रवासी हिमालयी लोगों के लिए क्या संदेश है?
प्रवासी लोगों को भी सक्रिय होना होगा। कुछ ऐसे युवकों की जरूरत है जो पूरा जीवन हिमालय की सेवा में लगा दें। प्रवासियों को बीच-बीच में अपने गांव भी जाना चाहिए। कुछ पैसा एकत्रित करके वहां स्वयंसेवक पैदा करने होंगे। हिमालय क्षेत्र के लोगों को जागरुक बनाना होगा। उन्हें सही मार्गदर्शन की जरुरत है। हिमालय के लिए व्यवहारिक नीति सरकार नहीं, जनता को तय करनी चाहिए। इसलिए, हमने हर साल नौ सितंबर को हिमालय दिवास मनाना शुरू किया । यह दिवस एक दिन मील का पत्थर साबित होगा।

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