ऊँ श्री गणेशाय नम : — रिद्धि और सिद्धि के दाता भगवान गणेश

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ऊँ श्री गणेशाय नम : /
प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम्, तृतीयं कृष्णपिड्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।   /
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च, सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम्।।    /
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्, एकादशं गणपतिं द्वादर्श तु गजाननम्।।    /
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः, न च विध्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्।।   /
भगवान श्री गणेश को हिन्दू धर्म में प्रथम पूजनीय ईश्वर  हैं ।  प्रत्येक शुभ कार्य से पहले सर्वप्रथम भगवान गणेश के पूजन का विधान है। माँ पार्वती और भगवान शिव के पुत्र गणेश जी की सवारी मूषक यानि चूहा और प्रिय भोग मोदक (लड्डू) है। हाथी जैसा सिर होने के कारण भगवान गणेश को गजानन भी कहा जाता है।
गणेश जी के जन्म की कहानी—–
बहुत बहुत साल पहले जब पृथ्वी पर राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तब महादेव शिव देवों की सहायता करने शिवलोक से दूर गए हुए थे। माता पार्वती, शिव भगवान की धर्मपत्नि, शिवलोक में अकेली थीं। जब पार्वती जी को स्नान करने की ईच्छा हुई तो उन्हें घर के सुरक्षा की चिंता हुई। वैसे तो शिवलोक में शिव जी की आज्ञा के बिना कोई पंख भी नहीं मार सकता था, पर उन्हें डर था कि शिव जी की अनुपस्थिति में कोई अनाधृकित प्रवेश ना कर जाए। अतः उन्होंने सुरक्षा के तौर पर अपनी शक्ति से (माता पार्वति को माता शक्ति भी कहा जाता है) एक बालक का निर्माण किया, और उनका नाम रखा गणेश। उन्होंने गणेश जी को प्रचंड शक्तियों से नियुक्त कर दिया और घर में किसी के भी प्रवेश करने से रोकने के कड़े निर्देश दिये। इसी के साथ माता पार्वति अपने स्नान प्रक्रिया में व्यस्त हो गईं और गणेश जी अपनी पहरेदारी में लग गए। इधर राक्षसों पर देवों का पलड़ा भारी पड़ रहा था। शिव जी युद्ध में विजयी हुए और खुशी-खुशी शिवलोक की तरफ चल पड़े। घर पहुँचकर सर्वप्रथम उन्होंने पार्वति माता को अपने विजय का समाचार सुनाने की ईच्छा की। परन्तु शिव जी के प्रभुत्व से अनजान गणेश जी ने उन्हें घर में प्रवेश करने से रोक दिया। अपने ही घर में प्रवेश करने के लिए रोके जाने पर शिव जी के क्रोध का ठिकाना ना रहा। उन्होंने गणेश जी का सर धड़ से अलग कर दिया और घर के अंदर प्रवेश कर गए। जब पार्वति जी को यह कहानी सुनाई उन्हें गणेश जी के मृत होने का समाचार सुनकर बड़ा रोष आया। उन्होंने शिव जी को अपने ही पुत्र का वध करने की दुहाई दी और उनसे गणेश जी को तुरन्त पुनर्जिवित करने का अनुरोध किया। रूठी पार्वति माता को मनाने के अलावा शिव जी के पास कोई दूसरा रास्ता भी ना था। शिव जी ने कहा कि गणेश जी का सर पुनः धर से तो नहीं जोड़ा जा सकता, परन्तु एक जीवित प्राणी का सर स्थापित जरूर किया जा सकता है। शिव जी के सेवक जंगल में ऐसे प्राणी को ढूँढने निकले जो उत्तर दिशा की तरफ सर रख कर सो रहा हो। ऐसा ही एक हाथी जंगल में उत्तर दिशा की तरफ मुख किए सो रहा था। शिव जी के सेवक उसे उठा कर ले आए। शिव जी ने हाथी का सर सूँड़-समेत गणेश जी के शरीर से जोड़ दिया और इस प्रकार गणेश जी के शरीर में पुनः प्राणों का संचार हुआ। इतना ही नहीं, शिव जी ने यह भी उद्घोष्ना की कि पृथ्वीवासी किसी भी नए कार्य को शुरू करने से पहले गणेश भगवान की अराधना करेंगे और शुभारंभ के आशीर्वाद की लालसा करेंगे।
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गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं—-

सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश,विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन।
ये 12  नाम नारद पुरान मे पहली बार गणेश के द्वादश नामवलि मे आया है| विद्यारम्भ तथ विवाह के पूजन के प्रथम मे इन नामो से गणपति के अराधना का विधान है|  भगवान गणेश के इन 12 संकटनाशक नामों के ध्यान का बड़ा महत्व बताया गया है। इन बारह नामों का सुबह, दोपहर और शाम के अलावा हर रोज भी छ: माह तक बोलने से विद्या, धन, संतान और स्वास्थ्य के इच्छुक हर भक्त की हर इच्छा पूरी हो जाती है। साथ ही जीवन में आने वाली अड़चनों और संकटों से छुटकारा मिलता है। भगवान गणेश के बारह नामों का यह पाठ संकटनाशक स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है।

प्रणम्यं शिरसां देवं गौरीपुत्र विनायकम्।

भक्तावासं स्मरेन्नित्मायु: कामार्थसिद्धये।।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदतं द्वितीयकंम्।

तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।

नवमं भालचद्रं च दशमं तु विनायकम।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननमं।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यं पठेन्नर:।

न च विघ्रभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनं।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम।।

जपेद्गणपतिस्तोत्रम षड्भिर्मासै: फलं लभेत।

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्य लिखित्वा य: समर्पयेत। तस्य विद्याभवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।
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 भगवान गणेश के कई नाम हैं —

संकटों का नाश करते हैं भगवान श्री गणेश के 12 नाम

रिद्धि और सिद्धि के दाता भगवान गणेश हर तरह से पूजनीय हैं। भगवान गणेश जीवन में सफलता देते हैं। साथ ही हर तरह के संकटो का नाश भी भगवान गणेश करते हैं। किसी भी तरह की मुसीबत में पड़ने पर गणेश जी के संकटनाशक इस मंत्र का जप करना चाहिए। यह मंत्र मुसीबतों से बाहर निकलने में मदद करता हैं।

संकटनाशक गणेश मंत्र—

सुमुखश्चएकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः लम्बोदश्च च विकटो विघ्न नाशो विनायकः धूम्रकेतू गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः द्वादशैतानि नामानि यः पठैच्छ श्रृणुयादपि। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा संग्रामे संकटश्चैव विघ्नतस्य न जायते।
भगवान श्री गणेश को हिन्दू धर्म में प्रथम पूजनीय माना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्य से पहले सर्वप्रथम भगवान गणेश के पूजन का विधान है। इनकी सवारी मूषक यानि चूहा और प्रिय भोग मोदक (लड्डू) है।

हाथी जैसा सिर होने के कारण भगवान गणेश को गजानन भी कहा जाता है। शिवपुत्र, गौरी नंदन जैसे नामों से साथ गणेश जी को विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है जैसे मुंबई में गणेश जी को गणपति बप्पा मोरया के नाम से जाना जाता है। गणेश जी को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। गणेश जी के कुछ प्रमुख नाम निम्न हैं:
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गणेश नामवली-108

1. बालगणपति : सबसे प्रिय बालक
2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान
4. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर : एकल अक्षर
6. एकदन्त : एक दांत वाले
7. गजकर्ण : हाथी की तरह आंखें वाला
8. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान
9. गजनान : हाथी के मुख वाले भगवान
10. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुँह है
12. गणाध्यक्ष : सभी गणों के मालिक
13. गणपति : सभी गणों के मालिक
14. गौरीसुत : माता गौरी के पुत्र
15. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले
16. लम्बोदर : बड़े पेट वाले
17. महाबल : बलशाली
18. महागणपति : देवो के देव
19. महेश्वर : ब्रह्मांड के भगवान
20. मंगलमूर्त्ति : शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन : जिसका सारथी चूहा
22. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर : सब के बीच प्रथम आने वाले
24. शूपकर्ण : बड़े कान वाले
25. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु
26. सिद्धिदाता : इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक : सफलता के स्वामी
28. सुरेश्वरम : देवों के देव
29. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड
30. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता : अनन्त देव
32. अमित : अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना
34. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न : बाधाओं को हरने वाले
36. भीम : विशाल
37. भूपति : धरती के मालिक
38. भुवनपति : देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता
40. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले
42. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी : बुराइयों और असुरों के विनाशक
44. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले
46. धार्मिक : दान देने वाला
47. दूर्जा : अपराजित देव
48. द्वैमातुर : दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र : एक दांत वाले
50. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर : जिसका हथियार गदा है
52. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन : जो सभी गुणों के ज्ञानी
54. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब : माँ का प्रिय पुत्र
56. कपिल : पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश : कवियों के स्वामी
58. कीर्त्ति : यश के स्वामी
59. कृपाकर : कृपा करने वाले
60. कृष्णपिंगाश : पीली भूरि आंख वाले
61. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला
62. क्षिप्रा : आराधना के योग्य
63. मनोमय : दिल जीतने वाले
64. मृत्युंजय : मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है
66. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित : जिसे संगीत से प्यार हो
68. नमस्थेतु : सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन : भगवान शिव का बेटा
70. सिद्धांथ : सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाला
72. प्रमोद : आनंद
73. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व
74. रक्त : लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहीते
76. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकर्ता
77. सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता
78. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार : ओम के आकार वाला
80. शशिवर्णम : जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन : जो सभी गुण के गुरु हैं
82. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले
84. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख : शुभ मुख वाले
86. स्वरुप : सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण : जिसकी कोई आयु न हो
88. उद्दण्ड : शरारती
89. उमापुत्र : पार्वती के बेटे
90. वरगणपति : अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता
92. वरदविनायक : सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति : वीर प्रभु
94. विद्यावारिधि : बुद्धि की देव
95. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले
96. विघ्नहर्त्ता : बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले
98. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान
100. विघ्नविनाशाय : सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर : सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान
102. विकट : अत्यंत विशाल
103. विनायक : सब का भगवान
104. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा : संसार के स्वामी
105. यज्ञकाय : सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
106. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव
108. योगाधिप : ध्यान के प्रभु


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